न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 15 जून 2026 जामताड़ा। जामताड़ा भाजपा में इन दिनों संगठनात्मक असंतोष और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में पार्टी के एक समूह ने झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू से मुलाकात कर जिला संगठन में बढ़ती गुटबाजी और चुनावी पराजयों के लिए वर्तमान नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया। प्रतिनिधिमंडल का आरोप था कि जामताड़ा और नाला विधानसभा क्षेत्रों में लगातार मिल रही हार के पीछे संगठन के भीतर की खींचतान प्रमुख कारण है। हालांकि, इस शिकायत के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में एक अलग ही चर्चा शुरू हो गई है। कई लोगों का मानना है कि शिकायत दर्ज कराने वालों में ऐसे चेहरे भी शामिल हैं, जिन पर पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी सीता सोरेन के खिलाफ सक्रिय रहने के आरोप लगते रहे हैं। चुनाव के समय पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाने, सार्वजनिक मंचों और मीडिया के माध्यम से विरोध दर्ज कराने तथा वैकल्पिक उम्मीदवारों के समर्थन में माहौल बनाने की चर्चाएं उस समय भी सुर्खियों में रही थीं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वर्तमान विवाद केवल संगठनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि पद और प्रभाव की राजनीति से भी जुड़ा दिखाई देता है। संगठन के हालिया विस्तार में अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं मिलने के बाद कुछ नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई है। यही वजह है कि अब वही लोग संगठन में एकता और अनुशासन की जरूरत पर जोर देते नजर आ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि पार्टी को नुकसान पहुंचा है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल वर्तमान नेतृत्व पर कैसे डाली जा सकती है, जबकि अतीत में कई नेताओं पर पार्टी लाइन से अलग चलने और व्यक्तिगत राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देने के आरोप लगते रहे हैं। कुछ नेताओं का राजनीतिक सफर भी लगातार बदलते समीकरणों का गवाह रहा है। कभी पार्टी छोड़ना, कभी दूसरी राजनीतिक धारा से जुड़ना और फिर वापसी करना। दिलचस्प बात यह है कि चुनावी आंकड़े भाजपा के जनाधार में गिरावट की बजाय वृद्धि का संकेत देते हैं। वर्ष 2014 में जामताड़ा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को 58,349 वोट मिले थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 89,590 तक पहुंच गई। इसी अवधि में पार्टी का वोट शेयर 30.42 प्रतिशत से बढ़कर 36.72 प्रतिशत हो गया। आंकड़े बताते हैं कि मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन संगठन के भीतर नेतृत्व और वर्चस्व की लड़ाई अब भी जारी है। फिलहाल, भाजपा के भीतर चल रही यह खींचतान राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। आम लोगों के बीच भी यह टिप्पणी सुनने को मिल रही है कि राजनीति में अक्सर संगठन की मजबूती और कमजोरी का आकलन सिद्धांतों से कम और पदों के वितरण से अधिक होने लगता है। ऐसे में प्रदेश नेतृत्व के सामने चुनौती केवल विवाद सुलझाने की नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की भी है।
भाजपा की अंदरूनी जंग पर उठे सवाल: संगठन बचाने की मुहिम या खोई राजनीतिक जमीन तलाशने की कवायद?
