वर्ल्ड क्लास दावों की खुली पोल: एंबुलेंस नहीं मिली, ट्रैक्टर पर अस्पताल पहुंचा मरीज, इलाज के दौरान मौत

न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 13 जून 2026 जामताड़ा। स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार और विभागीय अधिकारियों के बड़े-बड़े दावों के बीच जामताड़ा जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। जिस जिले को राज्य के स्वास्थ्य मंत्री का गृह क्षेत्र माना जाता है, वहीं एक गंभीर मरीज को समय पर एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई। मजबूरी में परिजनों को ट्रैक्टर पर खटिया रखकर मरीज को अस्पताल पहुंचाना पड़ा, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।घटना जामताड़ा प्रखंड की गोपालपुर पंचायत अंतर्गत शहरबेड़ा गांव की है। जानकारी के अनुसार गांव निवासी मोनू टुडू की शुक्रवार शाम अचानक तबीयत बिगड़ गई। हालत गंभीर होने पर परिवार के लोगों ने तत्काल 108 एंबुलेंस सेवा से संपर्क किया। आरोप है कि कई बार फोन करने और सहायता की गुहार लगाने के बावजूद एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंची।समय बीतने के साथ मरीज की हालत और बिगड़ती गई। सरकारी व्यवस्था से कोई मदद नहीं मिलने पर ग्रामीणों और परिजनों ने खुद ही मरीज को अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया। गांव में उपलब्ध ट्रैक्टर-ट्रॉली पर खटिया रखकर मोनू टुडू को जामताड़ा सदर अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। चिकित्सकों ने इलाज शुरू किया, मगर उपचार के दौरान ही उसकी मौत हो गई।घटना के बाद परिजनों का आक्रोश फूट पड़ा। उनका कहना है कि यदि समय पर एंबुलेंस उपलब्ध करा दी जाती तो शायद मरीज की जान बच सकती थी। अस्पताल परिसर में मौजूद ग्रामीणों ने भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाए और इसे प्रशासनिक विफलता का उदाहरण बताया।यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को सामने लाता है। सरकार डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के दावे कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को आज भी ट्रैक्टर और निजी साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।मामले पर सिविल सर्जन डॉ. शिव प्रसाद मिश्रा ने स्वीकार किया कि जिले में एंबुलेंस की गंभीर कमी है। उन्होंने बताया कि जिले में पहले 13 एंबुलेंस संचालित थीं, लेकिन वर्तमान में 8 एंबुलेंस लंबे समय से खराब पड़ी हैं। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों और संबंधित एजेंसी को कई बार अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हो सका है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियादी कड़ी ही चरमराई हुई है, तो आम लोगों को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा कैसे मिलेगी? मोनू टुडू की मौत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी आज भी बेहद लंबी है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस घटना से सबक लेते हैं या इसे भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा।

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