जामताड़ा में किसानों का कमाल: जापान के दुर्लभ मियाजाकी आम ने दिलाई वैश्विक पहचान

न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 12 जून 2026 जामताड़ा। झारखंड का जामताड़ा जिला एक बार फिर अपनी अनोखी उपलब्धि के कारण सुर्खियों में है। जिले के कुंडहित प्रखंड स्थित अंबा गांव के दो प्रगतिशील किसान भाइयों ने ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने पूरे राज्य का गौरव बढ़ा दिया है। अरिंदम चक्रवर्ती और अनिमेष चक्रवर्ती ने दुनिया के सबसे दुर्लभ और महंगे फलों में गिने जाने वाले मियाजाकी आम की सफल खेती कर कृषि क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है।विशेष बात यह है कि दोनों किसानों ने इस विदेशी आम की खेती पूरी तरह जैविक पद्धति से की है। उनकी मेहनत और आधुनिक सोच का परिणाम है कि जापान की इस खास प्रजाति ने जामताड़ा की मिट्टी में भी शानदार उत्पादन दिया है। अपनी आकर्षक लालिमा और बेहतरीन स्वाद के कारण मियाजाकी आम को कई देशों में “रेड डायमंड” या “लाल सोना” के नाम से भी जाना जाता है।जानकारों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस आम की कीमत लाखों रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। इसकी दुर्लभता, उच्च पोषण मूल्य और विशेष औषधीय गुण इसे दुनिया के सबसे मूल्यवान आमों की श्रेणी में शामिल करते हैं। यही वजह है कि इसकी खेती को लेकर किसानों और बागवानी विशेषज्ञों के बीच विशेष उत्सुकता रहती है।अरिंदम और अनिमेष चक्रवर्ती ने बताया कि उन्होंने मियाजाकी आम के पौधे सीधे जापान से मंगवाए थे। एक पौधे की लागत लगभग ढाई लाख रुपये आई थी। काफी जोखिम और धैर्य के साथ उन्होंने अपने बागान में कुल आठ पौधे लगाए। इस वर्ष पेड़ों में पहली बार 10 से 12 फलों का सफल उत्पादन हुआ, जिसे वे अपनी वर्षों की मेहनत का परिणाम मानते हैं।इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर स्थानीय विधायक एवं झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र नाथ महतो ने दोनों किसानों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के किसानों द्वारा विश्वस्तरीय फसल का उत्पादन पूरे इलाके के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने किसानों से नवाचार और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने की अपील करते हुए कहा कि ऐसी पहलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती हैं।गौरतलब है कि चक्रवर्ती बंधुओं के बागान में आम की कई अन्य प्रजातियां भी मौजूद हैं, लेकिन मियाजाकी आम की सफलता ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई है। उनकी यह उपलब्धि अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है। जामताड़ा की धरती पर उगा यह “लाल सोना” साबित कर रहा है कि संकल्प, तकनीक और मेहनत के बल पर ग्रामीण किसान भी वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।

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