शहीद देवेंद्र मांझी की शहादत आज भी देती है जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को नई धार

न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 14 अक्टूबर रांची। झारखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले शहीद देवेंद्र मांझी की शहादत आज भी जनसंघर्षों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। 14 अक्टूबर को उनकी स्मृति में उन्हें याद करते हुए झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के संस्थापक सह प्रधान सचिव पुष्कर महतो ने कहा कि देवेंद्र मांझी की आवाज को भले ही दबाने की कोशिश की गई, लेकिन उनके विचार आज भी कोल्हान और सारंडा के जंगलों में गूंज रहे हैं।पुष्कर महतो के अनुसार, देवेंद्र मांझी का जन्म 15 सितंबर 1947 को एक गरीब आदिवासी किसान परिवार में हुआ था। बचपन में ही पिता जंगत मांझी का निधन हो जाने के बाद उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। सामाजिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ उनके भीतर बचपन से ही विरोध की भावना विकसित हुई। आगे चलकर उन्होंने आदिवासियों, मजदूरों और वंचित समुदायों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया।वर्ष 1969 में देवेंद्र मांझी ने बीड़ी श्रमिकों को एकजुट कर कंपनियों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। वर्ष 1971 में उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें हजारीबाग जेल भेजा गया, जहां उनकी मुलाकात शिबू सोरेन से हुई। बताया जाता है कि इसी दौरान दोनों ने झारखंड को अलग राज्य बनाने के लिए अपने-अपने क्षेत्रों में संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।जेल से रिहाई के बाद देवेंद्र मांझी ने जंगलों में बसे लोगों के जमीन संबंधी अधिकारों और आजीविका के सवालों को लेकर आंदोलन तेज किया। इस दौरान उन्हें कई कठिनाइयों और आरोपों का सामना करना पड़ा। उनके संघर्ष का प्रभाव कोल्हान और पोड़ाहाट क्षेत्र में व्यापक रूप से दिखाई दिया।14 अक्टूबर 1994 को गोईलकेरा हाट बाजार में देवेंद्र मांझी की हत्या कर दी गई। उनकी शहादत ने आदिवासी अधिकारों और झारखंड आंदोलन के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। पुष्कर महतो ने कहा कि शहीद के विचार और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा देते रहेंगे।

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