न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 30 जून 2026 जामताड़ा। हूल दिवस के अवसर पर मिहिजाम क्षेत्र के बढ़जोड़ा पंचायत स्थित सिद्धू-कान्हू प्रतिमा स्थल मंगलवार को आदिवासी संस्कृति, परंपरा और वीर शहीदों के सम्मान का केंद्र बना रहा। गुरु हड़ाम रेणु मुर्मू के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों ने भाग लेकर संताल हूल के महानायक वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो सहित सभी अमर सेनानियों के बलिदान को श्रद्धापूर्वक याद किया।कार्यक्रम की शुरुआत शहरडाल स्थित झामुमो कार्यालय से हुई, जहां विभिन्न गांवों और इलाकों से आए आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा, तीर-धनुष, भाला समेत अपने पारंपरिक अस्त्रों के साथ एकत्रित हुए। ढोल-तमक की गूंज और पारंपरिक गीतों के बीच युवा और युवतियों ने सामूहिक लोकनृत्य प्रस्तुत किया। पूरे माहौल में हूल आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत और आदिवासी संस्कृति की झलक साफ दिखाई दे रही थी। इसके बाद सभी लोग जुलूस की शक्ल में सिद्धू-कान्हू प्रतिमा स्थल पहुंचे।कार्यक्रम स्थल पर गुरु हड़ाम रेणु मुर्मू ने विधि-विधान के साथ वीर सिदो-कान्हू की प्रतिमा की पूजा-अर्चना कर माल्यार्पण किया। इसके उपरांत समाज सुधारक विनोद बिहारी महतो की प्रतिमा पर भी पुष्प अर्पित कर उनके सामाजिक योगदान को नमन किया गया। श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी बारी-बारी से प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर हूल आंदोलन के शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।इस अवसर पर गुरु हड़ाम रेणु मुर्मू ने कहा कि 1855 का संताल हूल केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह नहीं था, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन, स्वाभिमान और सामाजिक अधिकारों की रक्षा का ऐतिहासिक आंदोलन था। उन्होंने नई पीढ़ी से हूल आंदोलन के इतिहास और उसके मूल संदेश को जानने तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का आह्वान किया।श्रद्धांजलि सभा के बाद सामूहिक खिचड़ी प्रसाद का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया। पूरे कार्यक्रम में सामाजिक समरसता और सामुदायिक एकता का संदेश देखने को मिला।इस मौके पर भारतेंदु मुर्मू, बिष्णु देव मुर्मू, इम्तियाज खान, आलम अंसारी, नेहरू सोरेन, लखन किस्कू, मेरी मरांडी, सुलेखा रॉय, रानी सहित बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण, महिला-पुरुष, युवा एवं आदिवासी समाज के गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन हूल आंदोलन के शहीदों के आदर्शों पर चलने और समाज की एकजुटता बनाए रखने के संकल्प के साथ हुआ।
हूल दिवस पर परंपरा और संस्कृति का संगम, मिहिजाम में ढोल-तमक की थाप पर गूंजा वीर सिदो-कान्हू का गौरवगान
