न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 30 जून 2026 जामताड़ा। हूल दिवस के अवसर पर जामताड़ा प्रखंड के अमलाबनी रामपुर चौक टोला स्थित सिद्धू-कान्हू चौक में आयोजित श्रद्धांजलि एवं जनसभा कार्यक्रम में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा और संताल परगना की पहचान से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में आदिवासी और मूलवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक नई जनजागृति और संघर्ष की आवश्यकता है।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि संताल परगना सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी भूमि पर लगातार अवैध कब्जे की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन सरकार इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता और जनभागीदारी से संभव है।पूर्व मुख्यमंत्री ने हूल दिवस के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दिन वीर शहीद सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू, फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू के अदम्य साहस और बलिदान की याद दिलाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि शहीदों की जन्मस्थली भोगनाडीह में ग्रामीणों द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम को प्रशासनिक स्तर पर रोक दिया गया और पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में दंडाधिकारियों की तैनाती कर लोगों के बीच भय का वातावरण बनाया गया, जो हूल दिवस की ऐतिहासिक भावना के विपरीत है।चंपाई सोरेन ने कहा कि भोगनाडीह की धरती से ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह की शुरुआत हुई थी, जिसके बाद संताल परगना की अलग पहचान बनी और संताल परगना टेनेंसी कानून अस्तित्व में आया। उन्होंने कहा कि अलग राज्य बनने के बाद भी इस कानून का प्रभावी अनुपालन नहीं होने से आदिवासी समाज अपनी जमीन को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में आदिवासी भूमि पर अवैध कब्जे हुए हैं और इसे वापस दिलाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रहेगा।इससे पूर्व आदिवासी सवता सुसार अखाड़ा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि चंपाई सोरेन ने सिद्धू-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों के साथ उनका स्वागत किया गया और सांस्कृतिक वातावरण के बीच हूल आंदोलन के शहीदों को याद किया गया।कार्यक्रम में मंगल सोरेन, उत्तम हेम्ब्रम, सोनमुनि हेम्ब्रम, बीता हांसदा, सुनील हांसदा, मुखिया निर्मला सोरेन, दारा सिंह हेम्ब्रम, लालेश हेम्ब्रम, अर्जुन सोरेन, सुखेंद्र टुडू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के लोग मौजूद रहे। सभी ने हूल आंदोलन के शहीदों के बलिदान को नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
हूल दिवस पर चंपाई सोरेन का सरकार पर हमला, बोले– जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए फिर चाहिए ‘हूल’ जैसी जनचेतना
