न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 1 सितंबर जामताड़ा। बारिश के विदा होते ही प्रकृति ने शरद ऋतु के स्वागत की तैयारी शुरू कर दी है। आसमान में तैरते रूई जैसे सफेद बादल और धरती पर दूर-दूर तक खिले काश के फूल इन दिनों मौसम के बदलते मिजाज का खूबसूरत एहसास करा रहे हैं। खेतों की मेड़, नदी के किनारे, ग्रामीण इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में हवा के साथ झूमते काश के फूल लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। प्रकृति का यह मनमोहक नजारा मानो मां दुर्गा के आगमन का संदेश दे रहा है।वर्षा ऋतु के समाप्त होने और शरद के दस्तक देने के साथ काश अपने पूरे सौंदर्य में खिल उठता है। विशेषकर नदी और जलस्रोतों के आसपास की रेतीली जमीन पर इसके सफेद पुष्प दूर से ही आकर्षित करते हैं। हल्की हवा चलने पर काश के फूलों का सामूहिक रूप से लहराना ऐसा दृश्य प्रस्तुत करता है, जैसे धरती ने सफेद परिधान धारण कर लिया हो। काश एक घास की प्रजाति है, जिसका पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में भी उल्लेख मिलता है।भारतीय साहित्य और लोक संस्कृति में शरद ऋतु को लंबे समय से विशेष स्थान मिला है। पके धान की बालियां, निर्मल आकाश, खिले कमल और काश के उजले फूल शरद के सौंदर्य को पूर्णता प्रदान करते हैं। महाकवि कालिदास सहित अनेक कवियों ने शरद की प्राकृतिक छटा का मनोहारी चित्रण किया है।बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में काश फूल का रिश्ता दुर्गापूजा की परंपरा से बेहद गहरा है। काश के सफेद फूल दिखते ही लोगों को शारदीय दुर्गोत्सव और ढाक की गूंज की याद आने लगती है। साहित्य, चित्रकला और पूजा की सजावट में भी काश को मां दुर्गा के आगमन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि इन दिनों गांवों और नदी किनारे खिले काश के फूल वातावरण में उत्सव की आहट और नई उमंग भर रहे हैं।
काश के फूलों ने दी शरद की दस्तक, सफेद चादर में सजी धरती ने जगाया दुर्गोत्सव का उल्लास

