न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल मित्रा 21 सितंबर सालानपुर। अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों को लेकर ग्रामीण इलाकों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। इसी उद्देश्य से कोलकाता के एक कॉलेज की शोधकर्ता सृजिता मजूमदार शिकदार गांव-गांव में लोगों को बीमारी के लक्षण, बचाव और उपचार के प्रति जागरूक कर रही हैं। एक जागरूकता शिविर के दौरान उन्होंने बीमारी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानकारी साझा की।शोधकर्ता ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और कम शिक्षित लोगों के बीच डिमेंशिया को लेकर जानकारी का अभाव देखा जाता है। उन्होंने महिलाओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण कई महिलाएं अपनी सेहत की अनदेखी करती हैं। उन्होंने रसोई के धुएं के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों का भी उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि पहले डिमेंशिया को मुख्य रूप से 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब 45 वर्ष के बाद भी यंग ऑनसेट डिमेंशिया के मामले सामने आ सकते हैं। बीमारी के कारणों और प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिक जांच एवं चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।जल प्रदूषण और औद्योगिक कचरे से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का जिक्र करते हुए शोधकर्ता ने लोगों को स्वच्छ पेयजल इस्तेमाल करने की सलाह दी। हालांकि, अल्जाइमर का सीधा कारण पारे या किसी एक विशेष प्रदूषक को मानने के लिए चिकित्सकीय शोध के ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।उन्होंने स्पष्ट किया कि डिमेंशिया कोई शर्म या पागलपन की बीमारी नहीं है। परिवार में किसी व्यक्ति को लगातार भूलने, व्यवहार में बदलाव या रोजमर्रा के कार्यों में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच और उचित चिकित्सा से रोग के प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
गांवों में अल्जाइमर को लेकर जागरूकता की कमी, महिलाओं में अधिक जोखिम पर शोधकर्ता ने जताई चिंता

