लोकगीतों और परंपराओं के बीच संपन्न हुआ मधुश्रावणी व्रत, आस्था में डूबीं सुहागिनें

न्यूज 61 लाइव संवाददाता काजल राय चौधरी 16 अगस्त चित्तरंजन। मिथिला की समृद्ध लोकपरंपरा, दांपत्य प्रेम और शिव-पार्वती की आराधना से जुड़ा 16 दिवसीय मधुश्रावणी व्रत शुक्रवार को श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। व्रत के अंतिम दिन विवाहित एवं नवविवाहित महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर उद्यापन किया और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की।चित्तरंजन में भी कई नवविवाहित महिलाओं ने उत्साहपूर्वक मधुश्रावणी की परंपरा निभाई। पूजा स्थल को आकर्षक ढंग से सजाया गया। समापन अवसर पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से लोककथाओं का श्रवण किया और पारंपरिक गीतों के माध्यम से पर्व की खुशियां साझा कीं। इसके बाद प्रसाद एवं विशेष भोज का आयोजन किया गया।श्रावण मास में मनाए जाने वाले इस पर्व के दौरान महिलाएं लगातार 16 दिनों तक माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं। अंतिम दिन सुबह स्नान के बाद नए वस्त्र धारण कर घर-आंगन को पारंपरिक तरीके से सजाया गया। कई स्थानों पर गोबर से लीपन कर लोक चित्रकारी और अल्पना के जरिए पूजा स्थल को विशेष रूप दिया गया।पूजा के दौरान महिलाओं ने पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में प्रेम, परिवार की खुशहाली और घर में सुख-शांति की प्रार्थना की। समापन पर सुहागिनों ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मंगलकामनाएं दीं तथा उपहारों का आदान-प्रदान किया।इस अवसर पर बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी को मधुश्रावणी की धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों की जानकारी दी। क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में भजन-कीर्तन भी हुए। महिलाओं ने कहा कि मधुश्रावणी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने वाली जीवंत परंपरा है।

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