बंकिमचंद्र की कलम से लाल किले तक पहुंची एक ऐसी आवाज, जिसे समय और सत्ता दोनों नहीं रोक सके
संपादकीय : काजल राय चौधरी। 15 अगस्त की सुबह लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम्’ की धुन गूंजी। आसमान में भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्टर तिरंगे और ‘वंदे मातरम्’ का संदेश लेकर मंडरा रहे थे। ऊपर से पुष्पवर्षा हो रही थी और नीचे करोड़ों भारतीय उस धुन को सुन रहे थे, जिसने कभी औपनिवेशिक शासन के दौर में युवाओं के भीतर स्वाधीनता की आग को और तेज किया था।यह दृश्य केवल स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोह का हिस्सा नहीं था। यह इतिहास के एक लंबे चक्र के पूरा होने जैसा था। कभी जिस गीत के उच्चारण पर बच्चों पर जुर्माना लगाया गया, प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसीं और जिसे अंग्रेजी शासन ने चुनौती के रूप में देखा, आज वही गीत स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय मंच पर सम्मान के साथ गूंज रहा है।इस कहानी के केंद्र में हैं बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय—वह साहित्यकार, जिसकी कलम ने भारतीय राष्ट्रवाद को अभिव्यक्ति देने वाले सबसे प्रभावशाली शब्दों में से एक दुनिया को दिया।कांठालपाड़ा से शुरू हुई कहानी1838 में पश्चिम बंगाल के नैहाटी के कांठालपाड़ा में जन्मे बंकिमचंद्र एक प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनके पिता जादबचंद्र चट्टोपाध्याय सरकारी अधिकारी थे। शिक्षा पूरी करने के बाद बंकिमचंद्र भी ब्रिटिश प्रशासन की सेवा में आए और डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद तक पहुंचे।लेकिन सरकारी नौकरी के समानांतर उनके भीतर साहित्यकार जन्म ले चुका था।उन्होंने कविता से लेखन शुरू किया। शुरुआती प्रयासों में असफलता भी मिली। एक प्रतियोगिता में भेजी गई उनकी पांडुलिपि को सफलता नहीं मिली और वह बाद में लापता हो गई। मगर असफलता ने उन्हें रोक नहीं पाया।1864 में उनका अंग्रेजी उपन्यास ‘Rajmohan’s Wife’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1865 में ‘दुर्गेशनंदिनी’ ने बांग्ला साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात किया। फिर ‘कपालकुंडला’, ‘मृणालिनी’, ‘विषवृक्ष’ और ‘कृष्णकांतेर विल’ जैसी रचनाओं ने उन्हें बांग्ला साहित्य के अग्रणी साहित्यकारों में स्थापित कर दिया।1872 में उन्होंने ‘बंगदर्शन’ पत्रिका शुरू की। यह केवल साहित्यिक पत्रिका नहीं थी, बल्कि उस दौर में विचारों और नई चेतना के प्रसार का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनी।7 नवंबर 1875—दो शब्द, जिनमें समा गया राष्ट्रइसी साहित्यिक यात्रा के दौरान 7 नवंबर 1875 को ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुई कविता ने इतिहास की दिशा बदल दी—‘वंदे मातरम्’।दो शब्द, लेकिन अर्थ बेहद व्यापक।मां को नमन।मातृभूमि को प्रणाम।धीरे-धीरे यह रचना साहित्य के पन्नों से निकलकर जनभावना का हिस्सा बनने लगी। 1882 में बंकिमचंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ का प्रभाव साहित्यिक दायरे से बहुत आगे निकल गया।1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया। अब यह गीत सार्वजनिक राजनीतिक चेतना का हिस्सा बन चुका था।गीत से आंदोलन तकबंकिमचंद्र ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि उनकी रचना उनके जीवनकाल के बाद इतनी बड़ी ऐतिहासिक भूमिका निभाएगी।1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन तेज हुआ। ‘वंदे मातरम्’ आंदोलनकारियों की आवाज बन गया। जुलूसों में यह गूंजने लगा। युवाओं के बीच यह केवल गीत नहीं रहा, बल्कि आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का उद्घोष बन गया।औपनिवेशिक सत्ता को इसकी ताकत का अंदाजा हो चुका था। इसलिए इस आवाज को दबाने की कोशिशें भी शुरू हुईं।रंगपुर के एक स्कूल से जुड़े प्रसंग में लगभग 200 बच्चों पर ‘वंदे मातरम्’ कहने के कारण पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाए जाने का उल्लेख मिलता है। उस समय पांच रुपये की कीमत आज की तुलना में बहुत बड़ी थी।लेकिन असली बात रकम नहीं थी।सवाल यह था कि बच्चों के मुंह से निकले दो शब्द सत्ता को इतने भयभीत क्यों कर रहे थे?उत्तर साफ था—क्योंकि वे दो शब्द अब गुलाम भारत में स्वतंत्र चेतना की पहचान बन चुके थे।बरिसाल से लेकर लाहौर और बेलगाम तक आंदोलनों में इसकी गूंज सुनाई दी। कई जगह पुलिस कार्रवाई हुई। लेकिन आवाज दबने के बजाय और फैलती गई।इतिहास का यही स्वभाव है—जिस आवाज को दबाने की कोशिश की जाती है, यदि उसमें जनता की भावना बस जाए तो वह और दूर तक पहुंचती है।विडंबना यह कि बंकिम यह सब देख नहीं सकेबंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का निधन 8 अप्रैल 1894 को हुआ।उनकी उम्र लगभग 55 वर्ष थी।उनकी मृत्यु के दो वर्ष बाद ‘वंदे मातरम्’ सार्वजनिक रूप से कांग्रेस के मंच पर गूंजा। उनके निधन के 11 वर्ष बाद रंगपुर के बच्चों पर जुर्माने का प्रसंग सामने आया। और भारत की स्वतंत्रता के लिए अभी 53 वर्ष बाकी थे।उन्होंने न स्वदेशी आंदोलन देखा।न उन जुलूसों की आवाज सुनी।न अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उठते नारों को अपनी आंखों से देखा।न 15 अगस्त 1947 की सुबह देखी।और न आजाद भारत में लाल किले से अपनी रचना की गूंज सुनी।यही इस कहानी का सबसे भावुक पक्ष है—जिस व्यक्ति ने बीज बोया, वह स्वयं उसके वृक्ष को विशाल होते देखने के लिए जीवित नहीं था।बंकिम भवन की चौखट पर फिर लौटी वही धुन15 अगस्त से कुछ दिन पहले 12 अगस्त को नैहाटी के कांठालपाड़ा स्थित बंकिमचंद्र के पुराने घर के सामने भारतीय सेना की पूर्वी कमान के बैंड ने प्रस्तुति दी।वह वही भूमि थी, जहां बंकिमचंद्र ने जीवन का आरंभ किया था।वहां स्थानीय लोग, विद्यार्थी और शिक्षक मौजूद थे। बंकिमचंद्र के वंशज भी इस अवसर के साक्षी बने।एक ओर 19वीं सदी का वह घर, दूसरी ओर आजाद भारत की सेना का बैंड।एक ओर उस लेखक की स्मृति, दूसरी ओर उसी की रचना की राष्ट्रीय गूंज।इतिहास इससे अधिक सुंदर संवाद शायद ही रच सकता है।स्मारक बचेंगे तभी स्मृतियां बचेंगीबंकिमचंद्र की विरासत केवल किताबों में नहीं है। नैहाटी का बंकिम भवन आज भी उस साहित्यिक इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी है। वहां शोध और सांस्कृतिक गतिविधियां होती हैं।लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हम अपनी ऐतिहासिक विरासतों को वह सम्मान दे रहे हैं, जिसकी वे हकदार हैं?किसी राष्ट्र की स्मृति केवल स्मारक बनाकर नहीं बचती। उसके लिए शोध, संरक्षण, दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी से संवाद जरूरी है।बंकिमचंद्र के घर की दीवारें केवल ईंट-पत्थर नहीं हैं। वे उस दौर की गवाह हैं, जब भारत अपनी राष्ट्रीय पहचान की भाषा खोज रहा था।आज जब हम ‘वंदे मातरम्’ सुनते हैं, तो हमें केवल उसकी धुन नहीं सुननी चाहिए। हमें उसके पीछे छिपा संघर्ष भी याद रखना चाहिए।एक असफल लेखक से राष्ट्र की आवाज तकबंकिमचंद्र की कहानी एक और महत्वपूर्ण संदेश देती है।उनकी शुरुआती साहित्यिक कोशिश असफल हुई। उनकी पांडुलिपि खो गई। लेकिन उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।यही उनकी सबसे बड़ी सीख है—असफलता किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि अगले प्रयास की शुरुआत हो सकती है।एक असफल पांडुलिपि से शुरू हुई यात्रा ने उन्हें बांग्ला साहित्य का महान नाम बनाया। और उसी साहित्यकार की कलम से निकले दो शब्दों ने आने वाली पीढ़ियों को मातृभूमि के प्रति सम्मान की भाषा दी।आज के भारत के लिए ‘वंदे मातरम्’ का अर्थआज स्वतंत्र भारत में ‘वंदे मातरम्’ कहना किसी औपनिवेशिक प्रतिबंध को चुनौती देना नहीं है। आज इसकी असली परीक्षा कहीं अधिक गहरी है।क्या हम उस मातृभूमि का सम्मान करते हैं, जिसकी वंदना करते हैं?क्या हम उसके संविधान, लोकतंत्र, विविधता और नागरिक जिम्मेदारियों को उतना ही महत्व देते हैं?क्या हम भाषा, धर्म, क्षेत्र और विचार की विविधता के बावजूद भारत को एक साझा परिवार की तरह देख पाते हैं?यदि ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि के प्रति नमन है, तो इसका अर्थ केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि देश के प्रति जिम्मेदारी भी होना चाहिए।15 अगस्त की सुबह इतिहास का जवाब थालाल किले से गूंजती धुन और आसमान से बरसते फूलों का दृश्य दरअसल इतिहास का एक लंबा उत्तर था।कभी इसी गीत के लिए बच्चों पर जुर्माना लगा था।कभी इसके उच्चारण को रोकने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल हुआ था।और आज वही धुन स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह में सम्मान के साथ बज रही है।बीच में एक लंबी यात्रा है—गुलामी से स्वतंत्रता तक, भय से आत्मविश्वास तक और प्रतिबंध से सम्मान तक।इस यात्रा में बंकिमचंद्र की भूमिका केवल एक गीत के रचनाकार की नहीं, बल्कि उस चेतना के लेखक की है, जिसने आने वाली पीढ़ियों को मातृभूमि के लिए एक भावनात्मक भाषा दी।बंकिमचंद्र ने आजादी नहीं देखी, लेकिन आजादी की चेतना को शब्द जरूर दिए।उनकी आंखें बंद हो गईं, लेकिन उनकी कलम की आवाज चलती रही।कांठालपाड़ा के पुराने घर से लेकर लाल किले की प्राचीर तक पहुंची यह धुन हमें याद दिलाती है कि विचारों की उम्र इंसान से लंबी होती है।सत्ता बदलती है।पीढ़ियां बदलती हैं।समय बदलता है।लेकिन जो शब्द जनता के हृदय में जगह बना लेते हैं, वे इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।आज जब आसमान से फूल बरसते हैं और ‘वंदे मातरम्’ की धुन गूंजती है, तो उसके पीछे उन अनगिनत आवाजों को भी सुनना चाहिए, जिन्होंने कभी इसी गीत को स्वतंत्रता की पुकार बनाकर आगे बढ़ाया था।यही बंकिमचंद्र की सबसे बड़ी विरासत है—उन्होंने एक गीत नहीं लिखा, उन्होंने एक युग को अपनी आवाज दी।वंदे मातरम्।

